‘mid kariyar kraisis’ (Mid Career Crisis) ke shikaar (Victim) hain.. aise mein ek brek (break) to banata hai !

‘मिड करियर क्राइसिस’ (‘Mid Career Crisis’) के शिकार (Victim) हैं.. ऐसे में एक ब्रेक (break) तो बनता है !

जयपुर
Swati Jadhav 3
डॉ. स्वाति अमराळे जाधव,
सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं सामाजिक विषयों पर समसामायिक लेखन। परामर्शदाता प्रशिक्षक, अनुवादक तथा संशोधक। ‘जागतिक स्वास्थ्य संगठन’ के मानसिक स्वास्थ्य संशोधन में सहभागिता, बालक तथा बुजुर्ग व्यक्तिओं के मानसिक स्वास्थ्य में कार्य करने का अनुभव।  

प्रमोद बीस साल से एक सीए के फर्म में काम कर रहा है। इतने साल एक जैसा काम करके अपने काम में से वह रुचि खो बैठा है। वह चाहता है कि यह काम छोड़कर पर्यटन का व्ययसाय शुरू करे। उसे पहले से ही पर्यटन के क्षेत्र में दिलचस्पी थी। दुनिया के कोने- कोने में वह घूमना चाहता था। हर प्रदेश की संस्कृति-धरोहर को समझना चाहता था। लेकिन, परिवार में पिताजी, चाचा सभी सीए का ही काम करते थे। उनकी खुद की सीए फर्म थी। प्रमोद पढ़ाई में तेज था। घरवालों की इच्छा से उसने सीए कर लिया था। लेकिन, अब उसका इस काम में मन नहीं लग रहा था। अब आयु के इस पड़ाव पर नई शुरुआत करना उसे किसी जोखिम से कम नहीं लग रहा था। बच्चो की पढ़ाई, गाड़ी और घर की किश्तें कई सारी जिम्मेदारियां उस पर थीं इसलिए वह अपने ‘एकॉनॉमिक सेफ्टी जोन’ से बाहर निकलने से डरता था।

ऊबाऊ सी जिंदगी  

प्रमोद की तरह आईटी सेक्टर में काम करते हुए नीरजा को सात साल हुए थे। इन सात वर्षों में उसने तीन कंपनियां  बदली थीं। इतने कम समय में ही वह अपने काम से ऊब चुकी थी। आईटी क्षेत्र का लुभावना ‘सेलरी पैकेज’ और लाइफस्टाइल से आकर्षित होकर उसने आईटी में जाने की ठान ली थी। उसके लिए नीरजा ने बहुत परिश्रम भी किये थे । आखिर उसको अपने मनचाहे क्षेत्र में काम करने का अवसर मिल गया था। लेकिन, पिछले डेढ़ साल में उसे अपने काम के प्रति कोई उत्साह प्रतीत नही हो रहा था। अपने काम में उसे नयापन या कोई चुनौती चाहिए थी जो उसे किसी भी कंपनी में नहीं मिल रही थी। मानो जिंदगी में ‘ठहराव ’ सा आ गया हो।  

जब थमी-थमी सी लगे जिंदगी

‘ठहराव’ की यह स्थिति अक्सर मध्यम आयु की अवस्था में पायी जाती है। जिसे ‘मिड करियर क्राइसिस’ (Mid Career Crisis)   कहा जाता है। जिसमें व्यक्ति को अपने व्यवसाय या काम में कुछ वर्षो बाद अलगाव हो जाता है। करियर के संदर्भ में किये गये निर्णय के बारे में पछतावा होता है। उसे बेचैनी अनुभव होती है। काम छोड़ने की प्रबल इच्छा होना, चिड़चिड़ापन, गुस्सा और अवसाद  ‘मिड करियर क्राइसिस’ के कुछ लक्षण हैं। कुछ लोग इस मनोवस्था से बाहर निकलने के लिए प्रयास करते है। कभी-कभी वे अपनी पसंद के क्षेत्र में नई पारी से शुरुआत करते है। लेकिन, यह सबके लिए संभव नहीं हो पाता। ब्लड प्रेशर, डायबिटीज की बीमारी जैसे कम आयु में होते हुए दिखाई देती है। अब तो यह भी देखने में आता है कि युवावस्था में  ही ‘मिड करियर क्राइसिस’ के शिकार होने वालों की संख्या भी बढ़ रही है।

कंपनियां भी करती हैं अपने कर्मचारियों की मानसिक थकावट दूर करने के प्रयास

इन परिस्थितियों को टालने के लिए वर्तमान में कई कंपनियां अपने स्तर पर प्रयास करती है। काम की जगह पर ‘गेमिंग एलिमेंट्स’ तैयार किये जाते हैं। लगातार स्क्रीन के सामने बैठकर काम करने से या मशीन पर काम करने से आया हुआ तनाव/थकान दूर करने के लिए इन ‘गेमिंग एलिमेंट्स’ का उपयोग किया जाता है। एम्प्लॉई यहां पर अलग-अलग खेल खेलकर स्वयं को शिथिल करते है और फिर से नई ऊर्जा के साथ काम शुरू

करते है। कुछ कंपनियां ‘ग्रीन कैम्पस’ रखती हैं। जहां कैम्पस में एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए सिर्फ साइकिल का प्रयोग किया जाता है। कैफे-कैंटीन की सुविधाएं आजकल तो हर बड़ी कंपनी में दिखाई देती हैं। इन सारी सुविधाओं को एम्प्लॉई के लिए भावनात्मक स्वास्थ्य के निवेश के रूप में देखा जाता है।

नियमित जीवन से अलग कुछ नया करना जरूरी है

एक जैसी काम की स्थिति से ऊब जाना यह किसी भी आयु में, किसी के साथ भी हो सकता है। इस अवस्था को टालने के लिए आपको बदलाव की ऐसी जगह ढूंढनी होगी जहां होकर आने से आप स्वयं को ऊर्जावान अनुभव कर सकेंगे। जरूरी नहीं कि इसके लिए आप पैसे खर्च करके महंगे सफर पर जाएं। बहुत सारे छोटे -छोटे बदलाव भी आपको आनंद दे सकते है। नजदीकी टीलों पर ट्रैकिंग  के लिए जाना, नये पकवान बनाना, बागवानी करना, संगीत सीखना या सुनना, किताबॆ पढ़ना, वेबसिरीज देखना, कुछ सामाजिक कार्यो में सहभागिता लेना आदि कई चीजें आप कर सकते है। काम में बदलाव लाकर स्वयं को उर्जावान रखने का सर्वोत्तम उदाहरण हैं गृहणियां। खाना, बर्तन, कपड़े, साफ -सफाई यह उनके नित्यकर्म हैं। वो भी इन रोज के कामों से ऊब जाती हैं। लेकिन,  त्योहार, शादी-ब्याह, जन्मदिन, वर्षगांठ, मुंडन आदि उपक्रमों के माध्यम से वो ब्रेक लेकर स्वयं को ऊर्जावान बनाती हैं। उसी प्रकार ‘मिड करियर क्राइसिस’ टालने के लिए सब के लिए ‘ब्रेक तो बनता है !’   

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