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आखिर क्यों देश की आधी आबादी को अब भी सशक्तिकरण की जरूरत है..?

माया सिंह

देश-दुनिया में इन दिनों महिला सशक्तिकरण एक विशेष चर्चा का विषय है। पिछले कुछ वर्षों से महिलाओं के खिलाफ होने वाली लैंगिक असमानता और बुरी प्रथाओं को हटाने के लिए सरकार की ओर से कई संवैधानिक और कानूनी अधिकार बनाएं और लागू किए गए हैं। सरकार द्वारा महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए बहुत सी योजनाएं भी चलायी गयीं किंतु महिलाओं की स्थिति में कोई विशेष परिवर्तन नहीं पाया है।

प्राचीन ग्रंथों में कहा गया है कि जहां नारी की पूजा होती है वहां देवता वास करते हैं। नारी शक्ति का दूसरा रूप है लेकिन विडंबना तो देखिए नारी में इतनी शक्ति होने के बावजूद आज भी उसके सशक्तिकरण की अत्यंत आवश्यकता महसूस हो रही है। सशक्तिकरण का आशय उस योग्यता से है जिसमें वह अपने जीवन से जुड़े सभी निर्णय स्वयं ले सकें। महिला सशक्तिकरण का आशय उस क्षमता से है, जहां महिलाएं परिवार और समाज के सभी अनावश्यक बंधनों से मुक्त होकर अपने निर्णय की निर्माता खुद हों।

हमारा देश काफी तेजी से तरक्की कर रहा है लेकिन इसे हम तभी बरकरार रख सकते हैं जब हम लैंगिक असमानता को दूर कर पाएं और महिलाओं के लिए भी पुरुषों की तरह समान शिक्षा, तरक्की और समान भुगतान सुनिश्चित कर सकें। भारत की 50% से अधिक आबादी अब महिलाओं की है, मतलब पूरे देश के विकास के लिए इस आधी आबादी की जरूरत है, जो कि अभी तक सशक्त नहीं है और कई अनावश्यक सामाजिक प्रतिबंधों से बंधी हुई है। ऐसी स्थिति में हम नहीं कह सकते कि भविष्य में बिना हमारी आधी आबादी को मजबूत किए हमारा देश विकसित हो पाएगा। समाज में महिलाओं को सम्मान देने के लिए महिला देवियों को पूजन करने की परंपरा है लेकिन आज केवल यह एक ढोंग मात्र ही कहा जा सकता है।

एक ओर तो हम आधुनिकता की बात करते हैं, बदलाव की बात करते हैं, पर विचारों और मानसिकता में जो बदलाव अपेक्षित है, वह बदलाव आज तक नहीं आ सका है। जब-जब स्त्री अधिकारों की बात आती है तो परंपराओं या मजहब के नाम पर उसका हनन होता है।

जब कोई हादसा सुर्खियों में आता है तो आक्रोश जरूर नजर आता है। टीवी चैनलों पर गरमागरम बहस देखने को मिलती है। मोमबत्तियों के साथ जुलूस निकाले जाते हैं लेकिन महिलाओं के लिए हालात नहीं बदलते, आखिर क्यों ? इस क्यों का जवाब महिलाओं को स्वयं ढूंढना होगा। बेचारी बनकर चुपचाप रहकर अनुसरण मात्र से बदलाव नहीं आएगा। महिलाओं को अपनी शक्ति को पहचानना होगा। खुद पर विश्वास करना होगा। एक दूसरे के सम्मान के लिए एकजुट होकर आवाज उठानी होगी और तभी सही मायनों में महिलाओं की स्थिति में बदलाव आएगा और तभी महिला दिवस मनाना भी सार्थक होगा।

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