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‘दारू’ के लिए वन विभाग (forest Department) और पर्यटन (tourism) महकमों के बीच होगी ‘दे-दनादन’

जयपुर पर्यावरण

पर्यटन विकास के नाम पर कई दशको से चल रही थी धुप्पलबाजी

जयपुर। नाहरगढ़ फोर्ट से शनिवार शाम को पर्यटकों को बाहर निकाले जाने के बाद कहा जा रहा है कि अब जयपुर ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश में वन विभाग (forest Department) और पर्यटन (tourism) महकमों के बीच ‘दारू’के लिए ‘दे-दनादन’ हो सकती है। जानकार कह रहे हैं कि जहां दारू होगी, वहां जूतमपैजार होना तय है, क्योंकि पर्यटन को बढ़ाने के लिए शराब के साथ कबाब भी जरूरी हैं , तो दारू पीकर टुल्ल हुए पर्यटकों को ठहराने के लिए होटल भी जरूरी है। जबकि वन अधिनियम इनकी इजाजत नहीं देते हैं।

नाहरगढ़ फोर्ट ही नहीं प्रदेश के लगभग सभी अभ्यारण्यों और वन क्षेत्रों में अवैध रूप से वाणिज्यिक गतिविधियां हो रही है। सरिस्का और सवाईमाधोपुर के फोरेस्ट में बीयर बार का संचालन किया जा रहा है। सरिस्का और रणथंभौर में वन भूमि के अतिरिक्त इकोलॉजिकल जोन में होटलों का भी संचान किया जा रहा है। इनमें कई मामले न्यायालयों में लंबित पड़े हुए हैं। भरतपुर का घाना हो या राजसमंद सभी जगह वन क्षेत्रों में वन अधिनियमों की धज्जियां उड़ाते हुए अवैध वाणिज्यिक गतिविधियां धड़ल्ले से चल रही है।

नाहरगढ़ का मामला एनजीटी (NGT) में पहुंचा हुआ है और कहा जा रहा है कि अगर एनजीटी इस मामले में सख्त रुख अपनाती है तो पर्यटन विकास धरा रह जाएगा और वन क्षेत्रों में चल रहे शराब के अडड़ों और वाणिज्यिक गतिविधियों को बंद कराने के लिए वन विभाग और पर्यटन महकमों के बीच जंग छिड़ जाएगी।

यदि एनजीटी ने कोई सख्त फैसला दे दिया तो जो यही हाल आंधी की मार्बल माइंस और बजरी के मामले में देखने को मिल रहा है, वही हाल वन क्षेत्रों में चल रहे बीयर बारों और होटलों का हो सकता है। जानकार बता रहे हैं कि एनजीटी का फैसला सिर्फ नाहरगढ़ या राजस्थान के लिए नहीं होगा, बल्कि पूरे भारत में वन क्षेत्रों में चल रही वाणिज्यिक गतिविधियों के लिए नजीर बन सकता है।

क्या विभाग के अधिकारी एसी कमरों में ही बैठे रहेंगे

वन प्रेमी और आरटीआई एक्टिविस्ट कमल तिवाड़ी का कहना है कि नाहरगढ़ ही नहीं पूरे देश में कहीं भी वन क्षेत्र में शराब परोसना, रेस्टोरेंट संचालन, होटल संचालन गैर वानिकी गतिविधि है। इन गतिविधियों को वन विभाग को तुरंत प्रभाव से बंद कराना चाहिए और जिम्मेदारों के खिलाफ तुरंत कार्रवाई होनी चाहिए। यह जरूरी नहीं है कि हर मामले में जनहित याचिका लगाकर न्यायालय में लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी जाए। वन विभाग को भी अपने स्तर पर कार्रवाई करनी चाहिए। यदि दशकों से चल रही गड़बड़ियों पर विभाग की ओर से संज्ञान नहीं लिया गया तो इसका साफ मतलब है कि पूरा विभाग इन लोगों के साथ मिला हुआ है।

होटल, बीयरबार को परमिट किसने दिया, जांच का विषय

वन एवं वन्यजीव मामलों के वरिष्ठ अधिवक्ता महेंद्र सिंह कच्छावा का कहना है कि वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत किसी भी घोषित अभ्यारण्य क्षेत्र में बिना वैद्य परमिट के किसी भी व्यक्ति का प्रवेश निषिद्ध है, किसी भी प्रकार की वाणिज्यिक गतिविधि एवं उस एरिया में आना-जाना, रुकना, आग जलाना निषिद्ध कार्य हैं। इनके लिए सात साल से दस साल की सजा का और 5 लाख से लेकर 50 लाख रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान है। प्रदेश के अभ्यारण्यों में चल रहे बीयर बार, होटल, रेस्टारेंट को परमिट किसने दिया है, यह जांच का विषय है, क्योंकि इस तरह की गतिविधियों के लिए परमिट जारी करने का कोई प्रावधान कानूनों में नहीं है।

वन्यजीवों के मौत का कारण वाणिज्यिक गतिविधियां

नाहरगढ़ में सफाई अभियान चला रही एनजीओ होप एंड बियोंड के जॉय गार्डनर का कहना है कि वन्यजीवों की मौत का प्रमुख कारण वन क्षेत्रों में चल रही वाणिज्यिक गतिविधियां है। मंगलवार को सीकर जिले में बस्ती में घुसे बघेरे के मारे जाने की खबर सुर्खियों में रही। ऐसी खबरें वन क्षेत्रों के आस-पास बसी बस्तियों से आती रही है। इसके पीछे प्रमुख करण है कि वन क्षेत्रों में फैले कचरे के कारण शिकारी वन्यजीव घायल हो जाते हैं और शिकार नहीं कर पाते हैं।

ऐसे में वह आसान शिकार कुत्ते, बकरी, भेड़ के शिकार के लिए बस्तियों में घुसते हैं और मारे जाते हैं। नाहरगढ़ ही नहीं सरिस्का और रणथंभौर के अभ्यारण्ययों में भी कचरे की बड़ी समस्या है। बीयर बारों को जाने वाले रास्तों के आस-पास कांच की टूटी बोतलों का कचरा आसानी से यहां भी दिखाई देता है।

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