Hausala (courage) aur aatmavishvaas (Self confidence) se khelen nayee paaree (new inning)

हौसला (Courage) और आत्मविश्वास (Self Confidence) से खेलें नयी पारी (New Inning)

जयपुर
Swati Jadhav 2
डॉ. स्वाति अमराळे जाधव,
सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं सामाजिक विषयों पर समसामायिक लेखन। परामर्शदाता प्रशिक्षक, अनुवादक तथा संशोधक। ‘जागतिक स्वास्थ्य संगठन’ के मानसिक स्वास्थ्य संशोधन में सहभागिता, बालक तथा बुजुर्ग व्यक्तिओं के मानसिक स्वास्थ्य में कार्य करने का अनुभव

सीमा की आयु लगभग 45 के आसपास है। मुंबई में पली-बढ़ी सीमा ने 23 साल पहले एन्डोक्रोनोलॉजी में एमएससी. किया है। पढ़ाई के बाद शादी हुई और पति की ट्रान्सफरेबल नौकरी के कारण उसे अलग-अलग शहर रहना पड़ा। अब उसकी बेटी बड़ी हो गई है। वह दसवीं कक्षा में पढ़ती है। सीमा और उसका परिवार फिर से मुंबई शहर में आए हैं। छोटा परिवार होने के कारण सीमा के पास अभी बहुत समय खाली रहेता है। वह कुछ करना चाहती है। इसके लिए उसके पति और बेटी भी उसकी मदद करने के लिए तैयार हैं। लेकिन, पिछले बीस साल से अपने परिवार की देखभाल के अलावा उसने कुछ किया नहीं है। सीमा में हौसले (Courage) और आत्मविश्वास (Self Confidence) की इतनी कमी आई हैं कि वह पहले की तरह अब सड़क पर गाड़ी भी नहीं चला पाती है।

नयी पारी शुरू कर, पा सकते हैं सफलता

वह आत्मगौरव की कमी के कारण नकारात्मक भाव से वह घिरी हुई रहती है। वह अभी कुछ करना चाहती है लेकिन उसे समझ नहीं आ रहा की शुरुआत कहां से और कैसे करे ? इस स्थिति का सामना अनेक महिलाएं करती है। विज्ञापन में हम देखते हैं कि लॉकडाऊन में मध्यम आयु की महिलाओं ने कैसे अपने व्यवसाय का प्रारंभ किया अथवा अपनी रुचि को कैसे व्यवसाय में बदला। विज्ञापनों में दिखाया जाने वाला यह सैकेंड-मिनटों का खेल वास्तव में इतना सरल और आसान नहीं होता है। हां, महिलाएँ अपने जीवन में करियर की नयी पारी (New Inning) जरूर शुरू कर सकती है और उसमें निश्चित रूप से सफलता भी प्राप्त कर सकती हैं।

महिलाएं और मनोविज्ञान

मनोविज्ञान में जीवन के अलग-अलग पड़ाव दिये गये है। हर पड़ाव की स्थिति और इनमें आपकी भूमिका का वर्णन दिया गया है। ऐसे ही, शादी और बच्चों की देखभाल जीवन के कई पड़ावों में से एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव है। अन्य प्राणियों की तुलना में मनुष्य लंबे समय तक अपने परिवारवालों पर निर्भर रहेता है। बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए अभिभावकों को अपने युवावस्था के कुछ महत्वपूर्ण वर्षों को समर्पित करना, भावी पीढ़ी के हित में होता है। जैविक संरचना और पितृसत्तात्मकता के प्रभाव के कारण बच्चों को बड़ा करने में पुरुषों की तुलना में महिलाओं की सहभागिता अधिक देखने को मिलती है। महिलाएं परिवार के हर सदस्य का विशेष ध्यान रखती हैं। साथ ही वह मित्र-परिवार, समाज के रिश्ते-नातों को बांधकर रखने के लिए विशेष प्रयास करती हैं। लेकिन, एक समय ऐसा आता है, जब बच्चे बड़े हो जाते है, पढ़ाई और नौकरी के लिए घर छोड़कर दूसरी जगह रहने के लिए जाते है।

एक जैसी दिनचर्या से ऊब जाती हैं महिलाएं

 मनोविज्ञान में इस स्थिति को ‘लॉन्चिंग फॅमिली’/ ‘एम्टी नेस्ट’ (खाली घोंसला) कहा जाता है। संयुक्त परिवार में यह स्थिति कम पायी जाती है। लेकिन, एकल परिवार की महिलाओं को जीवनावस्था के इस स्थिति में बहुत ज्यादा खालीपन अनुभव होता है। विशेषकर उच्च शिक्षित महिलाओं को। पारिवारिक जीवन में 15 से 20 सालों से एक-जैसी दिनचर्या से महिलाएं मानसिक स्तर पर ऊब जाती हैं। हमारे यहां गृहिणियों को ‘होम मेकर’ का स्थान नहीं दिया जाता। इसके कारण महिलाएं अपना स्टेटस बताते समय ‘मैं होम मेकर’ हूं’, ऐसा गर्व और प्रतिष्ठा के साथ नहीं कह पातीं। बहुत दबी आवाज़ में, नाराज़गी से या निरर्थक भाव से ‘गृहिणी’ स्टेटस अधिकतर महिलाओं द्वारा बताया जाता है।

नयी पारी के लिए पारिवारिक सहयोग जरूरी 

परिणामस्वरुप उच्च शिक्षित होने के उपरान्त भी महिलाएं अपने आप को बहुत निम्न (लो) अनुभव करती है। जीवन के पड़ाव में करियर की ‘सैकंड ईनिंग’ शुरु करने में आत्मविश्वास की कमी, स्वयं को कम समझने की भावना और मानसिक रूप से परिवार के विचारों से लिप्त होना आदि चीजें व्यक्तित्व तथा आत्मप्रतिष्ठा के भाव को संजोगने में बाधाएं निर्माण कर सकती है। यह सारी बाधाएं विचारों से जुड़ी हुई होती हैं। इसे बदलने का काम महिलाएं स्वयं ही कर सकती हैं। बदलाव की प्रक्रिया को प्रत्यक्ष रुप में लाने के लिए परिवार का सहयोग भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। करियर की ‘सैकंड ईनिंग’ के साथ महिलाएं अपना करिअर बनाना चाहती हैं तो परिवार के हर सदस्य को उनकी पारिवारिक जिम्मेदारियां आपस में बांट लेनी चाहिए। इससे परिवार के हर सदस्य को स्वयंपूर्ण होने में भी मदद होगी। घर के पुरुष सदस्यों का मानसिक और प्रत्यक्ष सहयोग मिलने से समानता के बीजों की बुवाई अपने आप होती रहेगी।

पक्षी राज गरुड़ से सीख लें

महिलाओं को करियर की सैकंड ईनिंग करने के लिए आयु के इस विशेष पड़ाव पर महत्त्वपूर्ण बदलाव लाना जरूरी होता है। पक्षीराज गरुड़ की कहानी से कई लोग परिचित होगें। अपनी आयु के मध्य में गरुड़ जंगल में बहुत दूर चला जाता है। वहां पर सबसे पहले अपनी चोंच से वह अपने सारे छोटे-बड़े पंख निकाल लेता है, अपनी चोंच को पत्थर से टकराकर पूरी तरह से तोड़ देता है। पत्थर पर रगड़-रगड़ कर अपने नाखुनों को भी वह और अधिक तेज कर देता है। इस पीड़ादायी, कष्टप्रद प्रक्रिया के पश्चात गरुड़ को फिर से नये पंख, नाखून और चोंच आ जाती है। जिससे वह पहले से भी अधिक लंबी उड़ान भर में सक्षम हो जाता है।

भावनात्मक कठिनाइयों से पार पाना होगा

उर्वरित आयु के लिए गरुड़ अपने-आप को नये आत्मविश्वास के साथ सिद्ध कर लेता है। इसी तरह महिलाओं को भी अपने करियर की सैकंड ईनिंग करते समय मानसिक और भावनात्मक स्तर पर कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता हैं। अपने दैनंदिन जीवन को अलग ढांचे में ढलना पड़ता है। स्वयं के स्वभाव तथा आदतों में कुछ बदलाव लाने पड़ते है। इसकी शुरुआत छोटी-छोटी चीजों से की जा सकती है। शुरुआत में अपने करियर तथा रुचि के क्षेत्र में वर्तमान में क्या चल रहा है, इसके संदर्भ में जानकारी रखना, संबधित लोंगों से जाकर मिलना, शुरु-शुरु में सप्ताह में चार-पांच घंटे कार्य करना, धीरे-धीरे अपने कौशल और क्षमता में सुधार लाना आदि के रूप में महिलाएं नई शुरुआत कर सकती हैं। राजनीति से लेकर फिल्म जगत ‘सैकंड ईनिंग’ के कई उदाहरण महिलाओं के सामने  है। ‘नया प्रारंभ’ महिलाओं को उनके करियर की सैकंड ईनिंग के साथ-साथ उनकी ‘गरिमा’ को बनाये रखने में एक महत्त्वपूर्ण कदम रहेगा, इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती।

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