The executive is such that no one would be able to show the state president the dreams of being the chief minister

कार्यकारिणी ऐसी बनी कि अब कोई प्रदेशाध्यक्ष को नहीं दिखा पाएगा मुख्यमंत्री की कुर्सी के सपने

जयपुर

जयपुर। कांग्रेस आलाकमान ने गुरुवार रात राजस्थान कांग्रेस की प्रदेश कार्यकारिणी की घोषणा कर दी। कार्यकारिणी की घोषणा होते ही कांग्रेस में इसकी चीर-फाड़ होने लगी है। अधिकांश ने इस कार्यकारिणी को संतुलित बताया और सभी गुटों को इसमें प्रतिनिधित्व मिलना बताया, लेकिन कहने वाले कह रहे हैं कि कार्यकारिणी ऐसी बनी है कि अब कोई भी प्रदेशाध्यक्ष को मुख्यमंत्री बनने के सपने नहीं दिखा पाएगा।

राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बनने के समय से ही गहलोत और पायलट गुट में छत्तीस का आंकड़ा चल रहा था। हंगामा इतना बरपा था कि हर कदम पर आलाकमान को बीच-बचाव करना पड़ रहा था। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच शीतयुद्ध चल रहा था। इस दौरान कई बार मुख्यमंत्री ने मीडिया के साथ चर्चा में कहा था कि कुछ लोग नए प्रदेशाध्यक्षों को मुख्यमंत्री के सपने दिखा देते हैं। ऐसे में नए-नए अध्यक्ष बने लोगों के मन में गलतफहमी आ जाती है।

लेकिन अब कांग्रेस सूत्र कह रहे हैं कि नए प्रदेशाध्यक्ष गोविंद डोटासरा को कोई भी अगला मुख्यमंत्री बनने के सपने नहीं दिखा पाएगा, क्योंकि अब यहां सिर्फ राजनीति होगी। नई कार्यकारिणी में वह इतने उलझे रहेंगे कि उन्हें सपने देखने का मौका ही नहीं मिलेगा।

सूत्र बताते हैं कि नई कार्यकारिणी में तीनों प्रमुख गुटों पायलट, जोशी और गहलोत गुट के लोगों को जगह दी गई है। डोटासरा का पूरा समय इन गुटों के बीच समन्वय बनाने में ही निकल जाएगा। देखने वाली बात यह रहेगी कि डोटासरा किस तरह इन गुटों को साधते हैं या कार्यकारिणी डोटासरा का कितना सहयोग करती है या किस तरह डोटासरा खुद को मजबूत बनाते हैं। यह बात इस लिए कही जा रही है, क्योंकि कार्यकारिणी को गौर से देखने-समझने के बाद यही बात सामने आती है कि इसमें अधिकांश को पद देकर ठिकाने लगाया गया है।

यहां से शुरू हुई मुख्यमंत्री बनने के सपने की कहानी

कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि मुख्यमंत्री बनने के सपने की कहानी पूर्व प्रदेशाध्यक्ष के राजस्थान आगमन के साथ ही हुई थी। कुछ लोगों ने उनको गुमान कर दिया था कि अगले मुख्यमंत्री वही हैं। उनकी कार्यकारिणी में लगभग सभी सदस्य उनके समर्थक थे। यह समर्थकों की भीड़ इसी शर्त पर जमा हुई थी कि पद या टिकट मिलने पर वह मुख्यमंत्री बनने में उनका सहयोग करेंगे। वह कहते थे कि मैं मुख्यमंत्री बनने के लिए आया हूं, बैंगन बेचने के लिए नहीं।

इसकी सत्यता एक विधायक के हरियाणा में दिए गए बयान से साबित होती है। जिसमें उन्होंने कहा था कि मेरा मुख्यमंत्री गहलोत से कोई मनमुटाव नहीं है, लेकिन मुझे टिकट प्रदेशाध्यक्ष ने दिया था, इसलिए मैं उनके साथ हूं। खुद मुख्यमंत्री गहलोत ने भी दिल्ली रोड पर होटल के बाहर मीडिया से पूर्व प्रदेशाध्यक्ष के लिए कहा था कि वह कहता था कि मैं मुख्यमंत्री बनने आया हूं, बैंगन बेचने के लिए नहीं आया।

इसलिए गहलोत को मिली केरल की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी

जानकारों का कहना है कि राहुल गांधी ने शुरूआत में पूरे देश में नई लीडरशिप को उभारने का काम किया, लेकिन उन्हें कोई लाभ नहीं मिल पाया और लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की दुर्गति होने से उनका प्रधानमंत्री बनने का सपना टूट गया। राजस्थान में हुए प्रकरण के बाद गांधी को समझ में आ गया कि नई लीडरशिप की महत्वाकांक्षा बहुत ज्यादा है और वह खुद को स्थापित करने के चक्कर में पार्टी को नुकसान पहुंचाने से भी नहीं चूक रही।

राजस्थान में लोकसभा चुनावों में कांग्रेस का सूपड़ा साफ होने और कांग्रेस में चल रही गुटबाजी ने गांधी का नई लीडरशिप से मोहभंग करा दिया। अब कई राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में पार्टी ने अपने पुराने नेताओं को ही जिम्मेदारी सौंपी है, ताकि बिहार के बाद अन्य राज्यों में कांग्रेस को शर्मनाक हार का सामना नहीं करना पड़े। राहुल गांधी केरल से लोकसभा सदस्य हैं, इसलिए यहां की चुनावी कमान सबसे तेज-तर्रार और वरिष्ठ नेता अशोक गहलोत को सौंपी गई है।

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