Why should the Election Commission remain silent in the Sahada case, should not be taken cognizance?

सहाड़ा प्रकरण में चुनाव आयोग मौन क्यों, क्या नहीं लेना चाहिए प्रसंज्ञान?

जयपुर राजनीति

भीलवाड़ा के सहाड़ा में होने वाले उपचुनाव के नाम वापसी के अंतिम दिन भाजपा से बागी हुए लादूलाल पीतलिया ने अपना नामांकन वापस ले लिया। नामांकन वापसी के तुरंत बाद शुरू हुए सियासी घमासान के बीच अब सवाल उठ रहा है कि चुनाव आयोग इस मामले में मौन क्यों है? क्या इस मामले में चुनाव आयोग को प्रसंज्ञान नहीं लेना चाहिए। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस व अन्य विपक्षी दलों ने भी इस मामले में मौन साध लिया है। कांग्रेस का यह मौन शोध का विषय बन सकता है कि किस कारण कांग्रेस ने इस मामले में अभी तक चुनाव आयोग से शिकायत नहीं की।

निष्पक्ष चुनाव कराना चुनाव आयोग का काम है। यदि चुनावों में कहीं भय, प्रलोभन या अन्य कारणों से चुनाव प्रभावित होते हैं तो आयोग प्रसंज्ञान ले सकता है। सहाड़ा के मामले में भी पीतलिया के नामांकन वापस लेते ही उनके द्वारा 30 मार्च को मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को लिखा गया पत्र और कार्यकर्ताओं के साथ हुई वार्ता वायरल हो गई।

पत्र और वार्ता से स्पष्ट हो रहा है कि नाम वापसी के लिए पीतलिया पर दबाव बनाया गया था। पत्र में उन्होंने अपने व अपने परिवार की सुरक्षा की मांग की थी। भाजपा पर नाम वापसी और घमकाने के आरोप लगाए गए हैं। शनिवार, 3 अप्रेल को मीडिया में भी मुख्यमंत्री को लिखा पत्र और कार्यकर्ताओं के साथ हुई बातचीत प्रमुखता से प्रकाशित हो गई।

इतना सब होने के बाद भी अभी तक चुनाव आयोग द्वारा इस मामले में प्रसंज्ञान नहीं लिया जाना सवाल खड़ा कर रहा है। कांग्रेस में भी यह प्रकरण चर्चा का विषय बना हुआ है। कहा जा रहा है कि यदि आयोग किसी दबाव में है और स्वयं प्रसंज्ञान नहीं लेता है तो कांग्रेस समेत अन्य पार्टियों व प्रत्याशियों को इस मामले में चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज करानी चाहिए। इस मामले में यदि शिकायत नहीं की जाती और चुनाव आयोग भी कोई कार्रवाई नहीं करता है तो इसका सीधा फायदा भाजपा को मिलने वाला है।


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