Forest and Wildlife Act eclipsed on more than 200 crore iconic Amber project

200 करोड़ से अधिक के आइकॉनिक आमेर प्रोजेक्ट पर लगा वन एवं वन्यजीव अधिनियम का ग्रहण

जयपुर

जयपुर। केंद्र सरकार की आइकॉनिक टूरिस्ट डेस्टिनेशन परियोजना के तहत चिन्हित आमेर के प्रोजेक्ट पर वन एवं वन्यजीव अधिनियम का ग्रहण लगना शुरू हो गया है। दो सौ करोड़ से अधिक की इस परियोजना पर वन विभाग ने आपत्तियां उठाना शुरू कर दिया है। वन विभाग का मानना है कि पर्यटन गतिविधियों के लिए फोरेस्ट और रिजर्व फोरेस्ट को नुकसान नहीं पहुंचा सकते।

जानकारी के अनुसार 20 जनवरी को पर्यटन भवन में आइकॉनिक आमेर प्रोजेक्ट के तहत आमेर महल और कस्बे को विकसित करने के लिए कंसल्टेंट की ओर से बनाए गए प्लान का प्रजेंटेशन दिया गया कि किस तरह आमेर महल के आस-पास के क्षेत्र और कस्बे को विकसित किया जाएगा। पार्किंग, होटल, रेस्टोरेंट समेत किस तरह की सुविधाएं पर्यटकों के लिए उपलब्ध कराई जाएगी।

प्रजेंटेशन के बाद आयोजित बैठक में सभी विभागों के अधिकारियों ने अपनी राय और आपत्तियां जाहिर की। इस दौरान वन विभाग की आपत्तियों से सभी के कान खड़े हो गए। डीएफओ उपकार बोराण ने आपत्ति जताते हुए कहा कि आमेर महल के आस-पास का एरिया और कस्बे के चारों ओर फोरेस्ट व रिजर्व फोरेस्ट का एरिया आता है, ऐसे में कोई भी परियोजना शुरू करने से पहले वन विभाग से अनुमति ली जाए। कहा जा रहा है कि इस आपत्ति के आते ही बैठक समाप्त करनी पड़ी और कोई निर्णय नहीं हो पाया।

पर्यटन अधिकारियों को सूंघ गया सांप

सूत्रों के अनुसार डीएफओ की इस आपत्ति से पर्यटन, पुरातत्व, एडमा के अधिकारियों को सांप सूंघ गया, क्योंकि इस आपत्ति ने पूरी परियोजना पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया। पर्यटन अधिकारियों का कहना है कि किसी परियोजना के लिए वन विभाग से अनुमति मांगने का मतलब परियोजना को ठंडे बस्ते में डालना है, क्योंकि वन विभाग रिजर्व फोरेस्ट में अधिनियम के इतर किसी भी प्रकार के नवीन निर्माण की अनुमति नहीं देता। पूर्व में नाहरगढ़ रोपवे योजना भी दशकों से इसी कारण से अटकी पड़ी है।

इस लिए उठाई आपत्ति

कुछ समय पूर्व नाहरगढ़ किले में अवैध व्यावसायिक गतिविधियों का मामला उठा था। परिवादी की ओर से पर्यटन, पुरातत्व, आरटीडीसी, एडमा, वन, विद्युत विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को कानूनी नोटिस दिए जा चुके हैं, लेकिन इन विभागों की नोटिसों पर कोई जवाब देने की हिम्मत नहीं हो रही है। मामला एनजीटी तक पहुंच चुका है और कभी भी इन अधिकारियों को एनजीटी के नोटिस भी मिल सकते हैं। ऐसे में वन विभाग के अधिकारी रिजर्व फोरेस्ट को लेकर काफी सख्त हो गए हैं।

एडमा कौन होता है, वन क्षेत्र में काम कराने वाला

सूत्रों का कहना है कि डीएफओ की आपत्ति के बाद एडमा की तरफ से कहा गया कि वन विभाग से इजाजत मांगी तो यह प्रोजेक्ट कभी शुरू ही नहीं हो पाएगा। वन अधिकारियों ने भी एडमा को उनकी हैसियत बता दी। कहा गया कि एडमा कौन होता है रिजर्व फोरेस्ट में काम कराने वाला। किसी एनजीओ को हम वन क्षेत्र में नहीं घुसने दे सकते हैं। वन क्षेत्रों में विकास के लिए हमारी वन समितियां होती है, उनके जरिए ही कार्य कराए जा सकते हैं, वह भी वन और वन्यजीव अधिनियम के दायरे में। उल्लेखनीय है कि नाहरगढ़ रिजर्व फोरेस्ट में वनभूमि पर चार बीघा क्षेत्र में पेड़ों को काटकर पार्किंग बनाने से वन अधिकारी एडमा से काफी चिढ़े हुए हैं।

पर्यटन से जरूरी पर्यावरण विकास

नाहरगढ़ मामले में परिवादी कमल तिवाड़ी का कहना है कि देश की इकोनॉमी को बेहतर बनाने के लिए पर्यटन विकास जरूरी है, लेकिन पर्यावरण और वन्यजीवों की रक्षा उससे ऊपर आती है, क्योंकि पर्यावरण का सीधा संबंध देश के स्वास्थ्य से जुड़ा है। ऐसा नहीं है कि रिजर्व फोरेस्ट में पर्यटन नहीं होता। नाहरगढ़ में भी पर्यटन विभाग वन विभाग के साथ मिलकर ईको टूरिज्म शुरू कर सकता है, लेकिन पर्यटन के नाम पर वनों को नुकसान नहीं पहुंचने दिया जा सकता है।

इन्हें चुना था आइकॉनिक टूरिस्ट डेस्टिनेशन

केंद्र सरकार ने देश के 12 क्लस्टर्स में 17 प्रमुख पर्यटन स्थलों को चिन्हित किया था, जिन्हें आइकॉनिक टूरिस्ट डेस्टिनेशन के रूप में विकसित किया जाना था। वर्ष 2018-19 के बजट में इसका उल्लेख किया गया है। इन 17 टूरिस्ट डेस्टिनेशन में ताजमहल, फतेहपुर सीकरी, अजंता, एलोरा गुफाएं, हूमायू का मकबरा, लाल किला, कुतुब मीनार, कोल्वा बीच, आमेर का किला, सोमनाथ, धोलावीरा, खजुराहो, हंपी, महाबलीपुरम, कांजीरंगा, कुमारकोम और महाबोधि शामिल हैं।

विकास के बाद ये होगा बदलाव

पर्यटन के लिहाज से यहां पर सभी जरूरी सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी। स्थलों के विकास का काम भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और राज्य का पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग मिलकर करेगा। पूर्ण विकसित होने पर इन टूरिस्ट डेस्टिनेशंस पर पर्यटकों के लिए अतिरिक्त सुरक्षा, साफ -सफाई और ग्रीन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होगा। यहां पहुंचने के बेहतर साधन, स्थानीय भागीदारी बढ़ाना और पर्यटकों को अतिरिक्त सुविधाएं देने पर फोकस रहेगा। इन टूरिस्ट डेस्टिनेशंस के ब्रैंडिंग और प्रमोशन के लिए निजी निवेशकों की मदद ली जाएगी।

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