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राजस्थान पुरातत्व विभाग का फंड क्लियर नहीं हुआ तो, जयपुर अल्बर्ट हॉल में पानी से भीगी पुरा सामग्रियों को अभी तक नहीं मिला ट्रीटमेंट

जयपुर

जयपुर। पूरे विश्व में राजस्थान पर्यटन के लिए जाना-पहचाना नाम है। यहां के हैरिटेज और पुरा सामग्रियों को देखने के लिए हर वर्ष लाखों पर्यटक राजस्थान आते हैं, लेकिन राजस्थान पुरातत्व विभाग की ओर से बेशकीमती पुरा सामग्रियों के साथ जो भद्दा मजाक किया जा रहा है। नाकारा अधिकारियों की लेटलतीफी के चलते अब इन पुरा सामग्रियों को नष्ट करना ही आखिरी उपाय बचा है। अमूल्य धरोहरों के बर्बाद होने के बाद अब विभाग के अधिकारी अपनी नौकरी बचाने के लिए इधर-उधर की बयानबाजी कर रहे हैं।

प्रदेश के केंद्रीय संग्रहालय जयपुर अल्बर्ट हॉल में चार महीने पूर्व बारिश का पानी भरने से जो पुरा सामग्रियां खराब हो गई थी, उन सामग्रियों को बचाने के लिए अभी तक ट्रीटमेंट नहीं मिल पाया है। विभाग के अधिकारियों ने मामले की लीपापोती में चार महीने गुजार दिए, क्योंकि धरोहरों के नुकसान के लिए सीधे तौर पर विभाग के अधिकारी जिम्मेदार है।

विभागीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार विभाग के पास पुरा सामग्रियों के ट्रीटमेंट के लिए फंड भी नहीं आ पाया है, जिससे इनका प्राथमिक उपचार नहीं हो पाया है। सीलन रहने और प्राथमिक उपचार नहीं होने के कारण अधिकांश पुरा सामग्रियां बर्बाद हो चुकी है। पेपरमेशी के ऊपर किया गया सोने के पानी का काम खराब हो चुका है। चमड़े के सामानों और मगरमच्छ में कीड़े और फफूंद लग कर सामग्रियां खराब हो गई है। मिट्टी की कलाकृतियां गल चुकी है। कागज और कपड़े से बनी कलाकृतियों का हाल इतना खराब हो चुका है कि अब उनका ट्रीटमेंट नहीं हो सकता है और इन्हें नष्ट करना ही आखिरी उपाय है।

जानकरों का कहना है कि पानी में भीगने के तुरंत बाद यदि इन कलाकृतियों का प्राथमिक उपचार हो जाता तो अधिकांश को बचाया जा सकता था, लेकिन विभाग के काबिल अधिकारी पंखों के भरोसे कलाकृतियों को सुखाकर ठीक करने की बात कहते रहे। करीब डेढ़ महीने बाद तय हो पाया कि दिल्ली स्थित सरकारी संस्थान आईजीएनसीए से इनका उपचार कराया जाएगा। संस्थान ने उपचार के लिए 45 लाख का एस्टिमेट विभाग को पकड़ा दिया। अधिकारियों ने संस्थान से बारगेनिंग में डेढ़ महीने का समय लगा दिया और एस्टिमेट को कम करवा कर 35 लाख रुपए पर ले आए। अब सवाल यह उठता है कि विभाग के अधिकारियों के सामने बारगेनिंग ही जरूरी थी या फिर पुरा सम्पदाओं को बचाना भी ?

एक्सपर्ट ट्रीटमेंट के लिए तैयार हुए तो फंड की परेशानी आ गई। अधिकारियों की लेटलतीफी के चलते अभी तक संस्थान को फंड उपलब्ध नहीं हो पाया है। ऐसे में अभी तक ट्रीटमेंट शुरू नहीं हो पाया है, जबकि अधिकारी मीडिया को झूठे बयान दे रहे हैं कि पुरा सामग्रियों को सुरक्षित करने का काम शुरू कर दिया गया है। हकीकत यह है कि संस्थान की ओर से फंड के अभाव में सिर्फ खराब हुई सामग्रियों को सूचीबद्ध करने का काम किया गया है।

फंड आएगा तो काम शुरू हो जाएगा

आईजीएनसीए के प्रमुख एक्सपर्ट अचल पंड्या का कहना है कि अभी हम प्लानिंग कर रहे हैं कि किस तरह से ट्रीटमेंट किया जाएगा, क्योंकि डैमेज बहुत ज्यादा है। अधिकांश पुरा सामग्रियां पूरी तरह से बर्बाद हो गई है, लेकिन जो आंशिक खराब हैं, उन्हें सुधारने की कोशिश की जाएगी। मैटल और पत्थर की कलाकृतियों में आंशिक नुकसान है, लेकिन कागज, कपड़े, लकड़ी और चमड़े से बनी कलाकृतियों का कुछ भी नहीं किया जा सकता। अभी सिर्फ असेसमेंट और सेग्रिगेशन का काम किया गया है। खराब कलाकृतियों में से उनको छांटा गया है, जिन्हें ट्रीटमेंट दिया जा सकता है। अब ट्रीटमेंट का काम कब शुरू होता है, यह सब पुरातत्व विभाग पर निर्भर है। पुरानी चीजों को ठीक करने में पैसा लगता है, सामान खरीदना पड़ता है। जैसे ही पुरातत्व विभाग की ओर से ग्रीन सिग्नल मिल जाएगा, काम शुरू हो जाएगा।

कोरोना की भेंट चढ़ गई पुरा सामग्रियां

पुरातत्व कला एवं संस्कृति विभाग की प्रमुख शासन सचिव मुग्धा सिन्हा का कहना है कि हमने आईजीएनसीए के साथ एमओयू साइन करने की इजाजत पुरातत्व विभाग को दे दी है। राजस्थान में ऐसी कोई एजेंसी नहीं है, जो इस तरह का काम कर सके। इस तरह के काम कराने में काफी समय लगता है और हमें सेफ्टी और सिक्योरिटी का भी ध्यान रखना होता है। कोरोना काल की वजह से भी इस काम में देरी हुई है। तीन महीने तो पंखे चलाकर सामान को सुखाने में लग गए अब सबसे पहले कैटलॉगिंग का काम शुरू हो रहा है। हमने ट्रीटमेंट के लिए सेंग्शन दे दी है।

फंड अभी क्लियर नहीं हुआ

जयपुर अल्बर्ट हॉल के अधीक्षक राकेश छोलक का कहना है कि कलाकृतियों के ट्रीटमेंट का काम अभी शुरू नहीं हो पाया है। अभी हमें आमेर विकास एवं प्रबंधन प्राधिकरण (एडमा) से फंड क्लियर होकर नहीं आया है। फंड आते ही काम शुरू हो जाएगा। वहीं प्राधिकरण के कार्यकारी निदेशक (वित्त) का कहना है कि उन्हें इस तरह के किसी फंड की जानकारी नहीं है। सरकार की ओर से पुरातत्व विभाग को सीधे ही फंड भेजा जा सकता है। एडमा में तो अभी तक कोई फंड नहीं आया है।

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