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क्या पुरातत्व विभाग राजस्थान में चल रहा ‘पोपाबाई का राज’? हरे पत्थरों से बने 1000 वर्ष से भी पुराने पोपाबाई मंदिर का जीर्णोद्धार लाल रंग के सैंड स्टोन से कराया

जयपुर

धरम सैनी

राजनीतिक गलियारों में आपने ‘पोपाबाई का राज ‘ कहावत बहुत बार सुनी होगी। पोपाबाई का राज भारी आराजकता के लिए जाना जाता है, जहां इतनी छूट दे दी गई कि सभी लोग मनमानी करने लगे। इस कहावत का उद्गम स्थल कोटा जिले का आंवा गांव है, जहां किसी समय पोपाबाई का राज चलता था।

इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने भी ने भी आंवा में पोपाबाई के राज का उल्लेख किया है। जैसा पोपाबाई के राज में होता था, वैसा ही अब पुरातत्व विभाग राजस्थान में चल रहा है, जहां विभाग के अधिकारियों ने मनमानी से पुरातत्व नियमों की धज्जियां उड़ाकर अति प्राचीन आंवा स्थित पोपाबाई मंदिर समूह और झालावाड़ स्थित छन्नेरी-पन्नेरी मंदिर समूह का मूल स्वरूप ही बदल डाला।

कोटा जिले में स्थित आंवा गांव में प्राचीन मंदिरों का एक समूह है, जिन्हें पोपाबाई का मंदिर कहते हैं। इतिहासकारों के अनुसार आंवा में 12 मंदिरों का समूह था लेकिन पुरातत्व विभाग यहां आठ मंदिर ही मानता है। इनको 7वीं से 11वीं सदी के बीच का माना जाता है। इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर द आर्ट्स के शोध के अनुसार हाड़ौती क्षेत्र के मंदिरों में मालव, महामरु और महागुर्जर शैलियों का समन्वय दिखाई देता है। वहीं छन्नेरी-पन्नेरी मंदिर समूह भी इसी काल और इसी शैली के हैं और यहां तीन मंदिर हैं। राजस्थान के प्राचीन स्थापत्य को दर्शाते इन प्रमुख स्मारकों को जीर्णोद्धार के नाम पर अधिकारियों ने बर्बाद कर दिया है।

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हरे मटमैले पत्थरों की जगह लगाया लाल सैंड स्टोन
दोनों मंदिर समूह हरे मटमैले मेसनरी स्टोन से बने हैं, जो काफी मजबूत पत्थर होता है। पुरातत्व नियमों के अनुसार किसी भी प्राचीन स्मारक के संरक्षण और जीर्णोद्धार कार्य में उसी कालखंड से मिलती-जुलती सामग्री का ही इस्तेमाल किया जा सकता है ताकि स्मारक का मूल स्वरूप नहीं बिगड़े। लेकिन, इन मंदिर समूहों में लाल रंग का सैंड स्टोन लगा दिया गया, जिससे यह स्मारक अजूबे से नजर आ रहे हैं।

मंदिरों की कलात्मकता को किया खत्म
आंवा के मंदिर समूह में मंदिरों के फर्श से शिखर तक आकर्षक कलाकृतियां उकेरी हुई थीं। पुरातत्व विशेषज्ञों का मत है कि अब जो निर्माण कराया गया है वह प्राचीन मंदिर निर्माण शैली से मेल नहीं खा रहा है। जीर्णोद्धार में इन मंदिरों का मूल स्वरूप व कलात्मकता को खत्म कर दिया गया।

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पुराने पत्थरों का नहीं किया इस्तेमाल
पुरातत्व सूत्रों का कहना है कि विभाग के अधिकारियों ने कमीशन के फेर में इन मंदिरों के शिखर व अन्य भाग से गिर गर वहीं बिखरे हुए पत्थरों का पुन: इस्तेमाल नहीं किया है। मंदिर से गिरे हुए पत्थर अभी भी इन साइटों के आस-पास बिखरे पड़े हैं, जबकि नियमानुसार इन पुराने पत्थरों में उपयोग आने वाले पत्थरों को फिर से उपयोग में लिया जाना चाहिए था। कहा जा रहा है कि नया निर्माण होगा तभी अधिकारियों का कमीशन बनेगा। पुराने पत्थर इस्तेमाल करते तो मोटा बिल कैसे बनता। दोनों मंदिर समूहों के जीर्णोद्धार के लिए 8 करोड़ से अधिक के टेंडर जारी किए गए थे।

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अचानक बिगड़ गया खेल
सूत्रों का कहना है कि अधिकारियों और अभियंताओं की सहमति से दो वर्षों तक काम चलता रहा और पुरातत्व नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए मंदिरों का मूल स्वरूप नष्ट किया जाता रहा। स्थानीय लोगों एवं पुरातत्व के जानकार लोगों के विरोध के बाद इन कामों को रुकवाया गया। इसके बाद निदेशालय एवं अभियंताओं द्वारा कोटा संभाग अधीक्षक उमराव सिंह और ठेकेदार राजपूताना कंस्ट्रक्शन कंपनी को नोटिस दिया। इसके बाद विभाग ने उप निदेशक कृष्णकांता शर्मा की अध्यक्षता में कमेटी बनाकर दोनों मंदिर समूह की तकनीकी जांच कराई। उप निदेशक ने अपनी रिपोर्ट निदेशक पीसी शर्मा को सौंप दी है।

सवालों से भाग रहे अधिकारी
अति प्राचीन मंदिरों के मूल स्वरूप को बदलने के मामले में जब कोटा अधीक्षक से जानकारी चाही गई तो उन्होंने साफ कर दिया कि इस मामले में निदेशक ही कुछ बोल सकते हैं। विभाग के निदेशक से फोन पर इस बाबत जानकारी चाही गई लेकिन उन्होंने कई बार फोन करने के बावजूद फोन रिसीव नहीं किया। साथ ही अभियांत्रिकी शाखा के प्रमुख मुकेश शर्मा भी इस मामले में मौन साधे बैठे हैं।

गहलोत-कल्ला में कुछ गड़बड़ तो नहीं चल रहा
विभाग के सूत्र कह रहे हैं कि कांग्रेस सरकार आते ही स्मारकों की दुर्दशा शुरू हो गई है। कुछ अधिकारी राजनीतिक पहुंच का इस्तेमाल करके पुरातत्व विभाग में आए और चांदी कूटने में लग गए हैं। इन अधिकारियों को प्रदेश के स्मारकों और धरोहरों से कोई मतलब नहीं रहा है बल्कि उनका ध्यान तो मोटा कमीशन वसूलने में लगा है।

इन मंदिर समूहों के पीछे भी कमीशन का खेल बताया जा रहा है। हाल यह है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के आदेशों की यहां धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। आदेशों की अवहेलना पर मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से स्पष्टीकरण मांगा गया तो जवाब नहीं दिया गया। ऐसे में कहा जा रहा है कि कहीं गहलोत और कल्ला के बीच कुछ गड़बड़ तो नहीं चल रही, जो कल्ला के विभाग में मुख्यमंत्री के निर्देशों की धज्जियां उड़ाई जा रही है।

विभाग के अधिकारी साफ कह रहे हैं कि कितने भी घोटाले क्यों न उजागर हों, कितनी भी विरासत बर्बाद क्यों न हो जाए, हमारा कुछ नहीं बिगड़ सकता। बताया जा रहा है कि इन अधिकारियों का सीधा संपर्क मंत्री स्टाफ से चल रहा है। इतना बड़ा प्रकरण होने के बावजूद विभाग की शासन सचिव को इस मामले की जानकारी अभी तक नहीं दी गई है। यह सभी लक्षण पोपाबाई के राज के समान ही नजर आ रहे हैं।

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