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बिहार में हर तीसरा आदमी 6 हजार में कर रहा गुजारा..!

अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के पहले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक नया दांव चला है। विधानसभा में मंगलवार को सरकार ने जातीय गणना और आर्थिक, शैक्षणिक सर्वे की रिपोर्ट सदन के पटल पर रखा। इस बीच, नीतीश कुमार ने जातीय गणना को आधार मानते हुए आरक्षण का दायरा 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 65 प्रतिशत करने का प्रस्ताव रखा।
मेहनत के पसीने से तकदीर बदलने का हुनर आता है मुझे, तेरे टुकड़ों की कोई जरूरत नहीं… किसी शायर की ये चंद लाइनें बिहार के उस हर एक बाशिंदे पर सटीक बैठती हैं, जो कमरतोड़ मेहनत से कामयाबी की इबारत लिख रहा है। देश हो या दुनिया का कोई भी कोना, हर जगह बिहार के लोग अपनी मेहनत के दमपर परचम लहराने का हुनर रखते हैं। लेकिन आपको जानकर ताज्जुब होगा कि बिहार में गुजर-बसर करने वाले एक तिहाई परिवार आज भी गरीबी रेखा से नीचे जिंदगी गुजार रहे हैं। वे हर महीने 6 हजार या उससे कम कमा रहे हैं।
यही कारण है कि बिहार के लोगों को रोजगार के लिए अन्य प्रदेशों का रुख करना पड़ता है। अन्य प्रदेश के लोग भी उन्हें ताने देते हैं। कोई कहता है कि अपना राज्य छोड़कर यहां आ गए भीड़ बढ़ाने तो कोई उनकी भाषा और वेशभूषा का मजाक बनाता है। मगर साहब ये बिहारी हैं, इतनी जल्दी हार नहीं मानते। आखिरी दम तक संघर्ष करना इनके खून में शामिल है।
आपको पता है चंद्रयान -3 की सफलतापूर्ण लैंडिंग में बिहार के तीन युवा वैज्ञानिक भी शामिल थे। पृथ्वी पर दुख और तकलीफों के घुट पीकर चांद तक का सफर तय करना इतना आसान नहीं होता है। हमने देखा है कोरोना महामारी के वक्त के जब देश में लॉकडाउन लगा था, तब बिहार के लोग बिस्कुट और पानी पीकर पैदल ही दिल्ली और देश के अन्य राज्यों से पैदल ही बिहार की यात्रा पर निकल पड़े थे। किसी ने कोई शिकायत नहीं की, गहरे जख्मों को रुमाल से ढककर अपने-अपने घरों के लिए निकल पड़े। शर्म की बात तो ये है कि छोटे-छोटे बच्चों और महिलाओं की तकलीफ भी किसी को नहीं दिखाई दी। राजनीतिक सिस्टम पूरी तरह बेबस नजर आया।
हां, अगर चुनाव सिर पर हो तो बिहारियों को खुश करने में कोई चूक नहीं होनी चाहिए। बिहार के सीएम नीतीश कुमार इस मामले में माहिर खिलाड़ी है। चुनाव के वक्त बिहारियों के जख्मों पर मरहम लगाने का काम नीतीश से बेहतर और कौन कर सकता है। बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने आज लोकसभा चुनाव से पहले बड़ा दांव खेला है। नीतीश कुमार ने जातीय गणना को आधार मानते हुए आरक्षण का दायरा 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 65 प्रतिशत करने का प्रस्ताव रखा। लेकिन नीतीश बाबू भूल गए उनके प्रदेश में हर तीसरा आदमी 6 हजार में गुजारा कर रहा है और वह अब तक बस तीन कदम ही चल पाए। प्रदेश की मौजूदा हालत को देखते हुए नीतीश को बहुत कुछ करने की जरूरत है।
दरअसल बिहार में एक तिहाई परिवार गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर कर रहे हैं और वे प्रतिमाह 6000 रुपये या उससे कम कमा रहे हैं। जातीय सर्वेक्षण पर मंगलवार को विधानसभा में पेश की गई रिपोर्ट से यह बात सामने आई है। रिपोर्ट में यह भी स्वीकार किया गया है कि ऊंची जातियों में बहुत गरीबी है लेकिन पिछड़े वर्ग, दलितों और आदिवासियों का प्रतिशत उनसे अधिक है। संसदीय कार्य मंत्री विजय कुमार चैधरी द्वारा पेश की गई रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में लगभग 2.97 करोड़ परिवार रहते हैं, जिनमें से 94 लाख से अधिक (34.13 प्रतिशत) गरीब हैं।
75 प्रतिशत आरक्षण का प्रस्ताव
बिहार विधानसभा में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि जातीय गणना सर्वे से पिछड़ा और अति पिछड़ा सहित एससी और एसटी आबादी का जो आंकड़ा आया है, उसके मुताबिक आरक्षण बढ़ाने की जरूरत है। फिलहाल जो 50 प्रतिशत आरक्षण है, उसे हम 65 प्रतिशत कर दें। पहले से अगड़ी जातियों के आर्थिक रूप से कमजोर के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण है तो इस 65 प्रतिशत के बाद कुल आरक्षण 75 प्रतिशत हो जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य में 63,850 परिवारों के रहने का आवास नहीं है, ऐसे परिवारों के लिए राज्य सरकर जमीन खरीदने के लिए 1 लाख और मकान बनाने के लिए 1।20 लाख रुपये देने का भी सुझाव रखती है। उन्होंने कहा कि इस लक्ष्य को पूरा करने में पांच साल का समय लगेगा। राज्य में 94 लाख गरीब परिवार हैं। इन गरीब परिवार को 2 लाख रुपये राज्य सरकार की तरफ से मदद किया जाएगा। इसमें सभी जाति के गरीबों को मदद पहुंचाई जाएगी। मुख्यमंत्री ने विशेष राज्य का दर्जा की मांग को भी दोहराते हुए कहा कि अगर विशेष राज्य का दर्जा मिल जाए तो लक्ष्य जल्दी पूरा होगा।

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