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राजस्थान (Rajasthan) भाजपा (BJP) कब बंद करेगी ‘राजनीतिक भूल’ (political mistake) करना, पूनिया जी के हाथों से फिसले 2 महापौर

जयपुर राजनीति

जयपुर नगर निगम ग्रेटर महापौर सौम्या गुर्जर और तीन पार्षदों के सरकार की ओर से निलंबन के बाद भाजपा (BJP) में चर्चा गरम है कि आखिर प्रदेश भाजपा कब राजनीतिक भूल (political mistake)करना बंद करेगी। पिछले चार-पांच सालों में भाजपा की ओर से कई भयंकर राजनीतिक भूलें की गई, जिसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ रहा है।

ताजा एपिसोड पर भाजपा सूत्रों का कहना है कि प्रदेश की राजनीति में सतीश पूनिया का पगफेरा शुभ नहीं रहा है। उनके हाथ से अभी तक दो महापौर निकल चुके हैं। वहीं पार्टी विधानसभा उपचुनावों मे भी अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई। उनके आने के बाद पार्टी में अचानक से गुटबाजी बढ़ गई।

दिसंबर 2018 में तत्कालीन महापौर (Mayor) अशोक लाहोटी ने विधायक बनने के बाद त्यागपत्र दिया था। इसके बाद नए महापौर के लिए चुनाव होना था। भाजपा ने सतीश पूनिया को महापौर चुनाव के लिए संयोजक बनाया गया था।

सूत्र बता रहे हैं कि उस समय महापौर के चुनाव से पूर्व पार्षदों की बात नहीं सुनी गई थी और न ही पार्षदों (councilors) के मन की बात को संगठन तक पहुंचने दिया गया। हठधर्मिता दिखाते हुए भाजपा की ओर से उप महापौर मनोज भारद्वाज का नाम महापौर के लिए प्रस्तावित कर दिया गया, जबकि पार्षद चाहते थे कि पार्टी भारद्वाज के अलावा किसी को भी महापौर बना दे। नतीजा यह निकला कि भाजपा पार्षदों में बगावत हो गई। पार्षदों ने क्रॉस वोटिंग कर विष्णु लाटा को महापौर बनवा दिया। इसे भाजपा की बड़ी भूल बताया जा रहा है।

दूसरी भूल यह रही कि लाटा के महापौर चुने जाने के बाद भी बोर्ड और महापौर दोनों भाजपा के पास ही रहे, लेकिन भाजपा ने लाटा को पार्टी से निष्कासित कर दिया, जिसके चलते लाटा और उनके साथी पार्षद कांग्रेस में शामिल हो गए और भाजपा के हाथ से बोर्ड निकल गया।

भाजपा की तीसरी भूल सौम्या गुर्जर को महापौर बनाया जाना माना जा रहा है। गुर्जर के महापौर बनने के पीछे प्रदेश भाजपा की सहमति थी। बाहर की होने के कारण शहर भाजपा और विधायक गुर्जर से नाराज थे, लेकिन गुर्जर की कार्यप्रणाली को देखकर तो सभी लोग उनके खिलाफ हो गए। भाजपा ने बाहर की अनुभवहीन पार्षद को महापौर बनाया था तो उनपर कंट्रोल रखना चाहिए था, लेकिन पार्टी सौम्या गुर्जर पर कंट्रोल नहीं रख पाई और वह बेलगाम होकर कार्य करने लगी।

भाजपा अपने आप को अनुशासित पार्टी होने का दावा करती हैं, जबकि सौम्या गुर्जर पूर्व में अनुशासन तोड़ चुकी थी और भाजपा सरकार के दौरान ही उन्हें उनके पद से हटाया जा चुका था, तो फिर उन्हें महापौर बनाए जाने का निर्णय ही अनुचित था। इस निर्णय के लिए भी पूनिया को ही दोषी ठहराया जा रहा है। संगठन की रीति-नीति के विरुद्ध यदि किसी को पद पर बिठाया जाएगा, तो वह इस प्रकार के कृत्य करेगा और खामियाजा भाजपा को भुगतना पड़ता है।

यदि गुर्जर के बजाए भाजपा जयपुर की ही किसी ओबीसी महिला को महापौर बनाती तो शायद उन्हें यह दिन नहीं देखने पड़ते। ग्रेटर का महापौर गुर्जर समाज से बनाया जाना भी भाजपा की भूल माना जा रहा है। इस भूल के कारण जयपुर में मूल ओबीसी जातियों में से प्रमुख कुमावत और माली समाज भाजपा से काफी नाराज चल रहा है। जयपुर के आठों विधानसभा क्षेत्रों में इन दोनों जातियों के सबसे ज्यादा वोटर हैं, जबकि गुर्जर समाज का जयपुर शहर में ज्यादा जनाधार नहीं है।

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