दिल्लीधर्म

जलालशाह के विश्वासघात से गिराया गया राम मंदिर…काटे गए थे पुजारियों के सिर

नाम से ही काफी कुछ स्पष्ट होने लगता है। अयोध्या भी अपने नाम से स्वयं में निहित अपार संभावनाओं एवं सभी प्रकार के युद्ध से ऊपर अपनी अखंडता, अमरता एवं अहिंसा व्यक्त करती है। इस विरासत के अनुरूप यह न केवल रामानुरागियों, बल्कि मानव मात्र की आस्था के केंद्र में रही है और यहां से सभी को राम कृपा का प्रसाद मिलता रहा। यद्यपि अयोध्या के इस अप्रतिम अवदान का दुरुपयोग भी हुआ।
स्वयं रामजन्मभूमि इस विडंबना की परिचायक है। विश्वास न हो तो एक मार्च 1528 ई. को रामजन्मभूमि पर निर्मित मंदिर तोड़े जाने के पूर्व के घटनाक्रम पर गौर करें। रामजन्मभूमि के इतिहास पर पहली प्रामाणिक कृति छह दशक पूर्व प्रस्तुत करने का श्रेय रामगोपाल पांडेय ‘शरद’ को जाता है। इसके अनुसार ‘भारत पर मुगलों का अधिकार हो गया और सम्राट बाबर दिल्ली के राज सिंहासन पर बैठा। उस समय रामजन्मभूमि महात्मा श्यामानंद के अधिकार में थी। वह उच्चकोटि के सिद्ध महात्मा थे। उनके हृदय में ऊंच-नीच का भेद-भाव नहीं था। उनके समय में ख्वाजा कजल अब्बास मूसा आशिकाना यहां आए और महात्मा श्यामानंद के साधक शिष्य हो गए।
जन्मभूमि पर ख्वाजा की अपार श्रद्धा हो गई
उनके सत्संग से ख्वाजा साहब को रामजन्मभूमि का प्रभाव विदित हुआ और जन्मभूमि पर ख्वाजा की अपार श्रद्धा हो गई। एक दिन ख्वाजा ने श्यामानंद से प्रार्थना की, कि अपनी सिद्ध का थोड़ा-सा प्रसाद इस गुलाम को भी बख्श दीजिए। श्यामानंद ने कहा कि हिंदुओं के जितनी पवित्रता तुम रख नहीं सकते और यदि तुम्हें कहा जाय कि हिंदू धर्म स्वीकार लो, तो भी वह पवित्रता तुममें नहीं आ सकती, जो जन्म-जन्मांतरों के संस्कार से मनुष्य को प्राप्त होती है। अतएव तुम इस्लाम धर्म के अनुसार अपने ही मंत्र ‘लाइलाह इल्लिल्लाह’ का नियमपूर्वक अनुष्ठान करो। ख्वाजा ने इस सुझाव को स्वीकार किया और इस मंत्र का अनुष्ठान कर महान सिद्धि प्राप्त की।
दूसरा फकीर जलालशाह भी बना शिष्य
इसी बीच में जलालशाह नामक एक दूसरा फकीर भी आ गया और ख्वाजा कजल की भांति स्वामी श्यामानंद का शिष्य बन कर रहने लगा। जलालशाह को जब इस स्थान का महत्व विदित हुआ, तो उसे इस स्थान को खुर्द मक्का और सहस्रों नबियों का निवास स्थान सिद्ध करने की सनक सवार हुई। उसके प्रयत्न से लंबी-लंबी कब्रें बनवाई गईं। दिव्य-दैवीय जिंदगी पाने के उद्देश्य से सुदूर देशों तक से मुसलमानों के शव यहां लाए जाने लगे। भगवान की नगरी पूरी तरह कब्रों से पाट दी गई।
जलालशाह ने एक दिन ख्वाजा कजल अब्बास से कहा
जलालशाह ने एक दिन ख्वाजा कजल अब्बास से कहा कि इस मंदिर को तोड़ कर मस्जिद बनवानी होगी। इस पर ख्वाजा ने कहा कि अगर ऐसा हो गया तो भारत में इस्लाम की जड़ जम जाएगी। फतेहपुर सीकरी में बाबर और राणा सांगा में घमासान युद्ध हुआ। इस युद्ध में बाबर राणा सांगा के हाथों से आहत होकर भाग निकला और अयोध्या आकर जलालशाह की शरण ली। जलालशाह ने उसे विजयी होने का आशीर्वाद दिया, उससे प्रभावित होकर बाबर पुनः फतेहपुर सीकरी पहुंचा और राणा सांगा पर विजय प्राप्त की।
जलालशाह से प्रभावित बाबर फिर अयोध्या आया
जलालशाह से प्रभावित बाबर फिर अयोध्या आया। इस भेंट में जलालशाह ने बाबर को जन्मभूमि का राम मंदिर तोड़ कर मस्जिद बनाने के लिए बाध्य किया। बाबर यह काम अपने वजीर मीरबांकी खां के सुपुर्द करके दिल्ली चला गया।
पुजारियों के सिर काटे गए
बाबा श्यामानंद ने अपने साधक शिष्यों की करतूत पर पछताते हुए रामजन्मभूमि पर स्थापित चल विग्रह सरयूजी में विसर्जित कर दिया और दिव्य विग्रह को अपने साथ लेकर उत्तराखंड चले गए। पुजारियों ने मंदिर के द्वार पर खड़े होकर कहा कि पहले हम मर जाएंगे तब मंदिर के द्वार के भीतर कोई प्रवेश कर सकेगा। जलालशाह की आज्ञानुसार चारों पुजारियों का सिर काट लिया गया और तोपों की मार से मंदिर भूमिसात कर दिया गया’।
मंदिर की सामग्री से बनाई गई मस्जिद
मंदिर ध्वस्त किए जाने के बाद भी बाबर को इस स्थल की विरासत शिरोधार्य करनी पड़ी। शरद अपनी कृति में बताते हैं कि मंदिर की सामग्री से ही मस्जिद का निर्माण आरंभ हुआ। दिन भर में जितनी दीवार बनकर तैयार होती थी, शाम को वह अपने आप गिर पड़ती थी। महीनों तक यही तमाशा होता रहा। वजीर मीरबाकी हैरान था। दीवार के चारों और संगीनों का पहरा लगा दिया गया, मगर दीवार गिर जाने का क्रम अबाध गति से जारी रहा।
हिंदुओं को भजन-पाठ आदि करने की स्वतंत्रता
विवश होकर मीरबाकी ने सारा हाल बाबर को लिख भेजा। बाबर ने उत्तर दिया कि काम बंद करके वापस चले आओ, पर जलालशाह के अड़े रहने पर बाबर पुनः अयोध्या आया और उसने हिंदू महात्माओं को एकत्रित कर इस समस्या का समाधान पूछा। महात्माओं के ही सुझाव पर बाबर ने इस स्थान का नाम सीतापाक स्थान बनाए रखा। साथ ही, हिंदुओं को भजन-पाठ आदि करने की स्वतंत्रता दी। बाबर ने यह बात स्वीकार कर ली। मस्जिद के चारों ओर की मीनारें गिरवा दी गईं तथा द्वार पर मुड़िया और फारसी भाषा में श्री सीतापाक स्थान लिखवा दिया गया। उत्तर द्वार पर नष्ट सीतापाक स्थान फिर बनवा दिया गया।

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