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चमगादड़ों ने बिगाड़ी जैसलमेर की पटवा हवेलियों की सेहत, पुरातत्व विभाग के अफसरों ने 40 साल बाद ली सुध तो अब लगवाई जा रही हैं लाइटें

जयपुर

जयपुर। स्वर्णिम आभा से दमकती जैसलमेर की पटवा हवेलियां दशकों से पूरे विश्व में राजस्थान की स्थापत्य कला की पहचान बनी हुई हैं लेकिन पुरातत्व विभाग के अधिकारियों की लापरवाही अब इन हवेलियों पर भारी पड़ रही है। चमगादड़ों ने इन हवेलियों की सेहत को बिगाड़ कर रख दी है।

विभाग के सूत्रों का कहना है कि इस समय चमगादड़ व अन्य पक्षी इन हवेलियों के दुश्मन बने हुए हैं। पुरातत्व विभाग के अधीन आने वाली साढ़े तीन हवेलियों में देखरेख की कोई व्यवस्था नहीं होने के कारण इनमें चमगादड़ों ने डेरा जमा लिया है। चमगादड़ों के साथ कबूतर व अन्य पक्षियों का भी इन हवेलियों में जमावड़ा रहता है।

विभाग ने तीन हवेलियों में से सिर्फ एक हवेली को पर्यटकों के लिए खोल रखा है। सिर्फ इसी हवेली की हालत कुछ ठीक है, बाकी की हवेलियों में तो महीनों-महीनों तक साफ-सफाई नहीं हो पाती है। ऐसे में महीनों तक हवेली के कमरों व अन्य स्थानों पर सड़ने वाले पक्षियों के मल-मूत्र के कारण हवेलियां अपनी आभा खो रही है। यदि समय रहते इन हवेलियों में साफ-सफाई और पक्षियों को दूर करने का काम हो जाता, तो आज ये हवेलियां अपनी बदहाल हालत पर आंसू नहीं बहाती।

बरसों तक अंधेरी और सूनी हवेलियों में चमगादड़ तो अपना डेरा जमाते ही हैं। इन चमगादड़ों को भगाने का एक ही इलाज है कि इमारत में रोशनी कर दी जाए। वर्ष 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के दौरे के बाद पुरातत्व विभाग ने इन हवेलियों का अधिग्रहण किया था लेकिन विभाग के अधिकारी तब से लेकर अब तक इन हवेलियों में रोशनी का इंतजाम भी नहीं करा पाये। पर्यटकों के लिए खोली गई सिर्फ एक हवेली में लाइट लगी है। वह भी करीब चार वर्ष पहले ही लगाई गई है। सूत्रों का कहना है कि इस हवेली में लाइटें लगने के बाद चमगादड़ों की संख्या में तेजी से कमी आई है और यहां साफ-सफाई रहने लगी है।

अब करा रहे काम
हवेलियों की हालत खराब होने के बाद अब विभाग के अधिकारियों को इन हवेलियों की सुध आई है। विभाग की ओर से निकाली गई हवेलियों की निविदा में अब करीब पांच लाख रुपयों का लाइटों का काम भी जोड़ा गया है ताकि रात में इन हवेलियों में रोशनी का पुख्ता इंतजाम हो सके और चमगादड़ इन हवेलियों को छोड़ कर भाग जायें। इसी के साथ लोहे के जाल लगाने का काम भी किया जाएगा ताकि पक्षी हवेलियों के अंदर नहीं जा सके।

खल रही मैनपॉवर की कमी
विभाग की लापरवाही का एक उदाहरण यह भी है कि इन कलात्मक हवेलियों की देखरेख के लिए सिर्फ दो चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी दे रखे हैं। इनमें भी एक कर्मचारी टिकट बुकिंग करता है और एक कर्मचारी अन्य विभागीय कार्यों में व्यस्त रहता है। यहां कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने या फिर साफ-सफाई की अन्य व्यवस्था करने की जरूरत है, लेकिन विभाग के अधिकारियों का ध्यान तो सिर्फ कमीशन के फेर में संरक्षण कार्यों की ओर लगा है। सवाल विभाग के अधिकारियों की नीयत पर भी खड़े हो रहे हैं क्योंकि जब हवेलियों में साफ-सफाई की व्यवस्था नहीं है तो फिर यहां कराया जा रहा 50 लाख रुपये का केमिकल ट्रीटमेंट का कार्य कितने दिनों तक टिक पाएगा।

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