The rule of Popabai in Department of Archeology in Rajasthan: General officers do not want the problems like rules of work, so technical officers are being sidelined

पुरातत्व विभाग राजस्थान में पोपाबाई का राजः काम में नियमों की टांग न अड़े, इसलिए कर रहे तकनीकी अधिकारियों को दरकिनार

जयपुर

जयपुर। राजस्थान के पुरातत्व विभाग में पोपाबाई का राज चल रहा है। विभाग में बाहर से आए अधिकारी पुरातत्व नियमों को ताक में रखकर प्राचीन स्मारकों का मूल स्वरूप बदल रहे हैं, जिससे प्रदेश की प्राचीन धरोहरों पर संकट के बादल छाए हैं। कोटा के पोपाबाई मंदिर और झालावाड़ के छन्नेरी-पन्नेरी मंदिर समूह में अति प्राचीन मंदिरों का मूल स्वरूप बदलने के मामले के बाद यह बात सामने आ रही है कि प्रदेश भर के स्मारकों के संरक्षण और जीर्णोद्धार कार्यों में विभाग के तकनीकी अधिकारियों की राय का नहीं लिया जाना, जिससे स्मारकों का मूल स्वरूप बदल रहा है।

पुरातत्व विभाग के सूत्रों का कहना है कि पिछले दो दशकों में स्मारकों के संरक्षण और जीर्णोद्धार कार्यों के लिये अरबों रुपयों का बजट आया। बड़ा बजट देखकर स्मारकों पर गैर जरूरी कार्य कराये जाने लगे। इससे भी अधिकारियों का मन नहीं भरा तो स्मारकों में बेवजह तोड़-फोड़ करके कार्य कराए जाने लगे। यदि यह कार्य पुरातत्व नियमों के अनुसार होते तो शायद अरबों का यह बजट आज तक खर्च नहीं हो पाता। ऐसे में विभाग के तकनीकी अधिकारियों को किनारे किया जाने लगा, ताकि संरक्षण कार्यों में नियमों की टांग नहीं अड़ाई जा सके।

जानकार बता रहे हैं कि कोटा और झालावाड़ के अति प्राचीन मंदिरों के जीर्णोद्धार कार्यों से पूर्व उप निदेशक की अध्यक्षता में विभागीय अधिकारियों की कमेटी बनाई जानी चाहिए थी और इंजीनियरिंग शाखा की ओर से मंदिरों में कराए जाने वाले कार्यों की समस्त जानकारी कमेटी को दी जानी चाहिए थी। मंदिरों में यदि नए पत्थर लगाए जाने थे तो उन पत्थरों और अन्य निर्माण सामग्री के बारे में कमेटी से अनुमति लेनी चाहिए थी लेकिन ऐसा नहीं किया गया क्योंकि यदि कमेटी बनती और उससे यह राय ली जाती तो इंजीनियरिग शाखा के अधिकारियों की मनमानी नहीं चलती। उल्लेखनीय है कि विभाग के निदेशक प्रशासनिक सेवा से व इंजीनियरिंग शाखा के अधिकारी दूसरे विभागों से प्रतिनियुक्ति पर पुरातत्व विभाग में आते हैं। इन दोनों ही अधिकारियों को पुरातत्व नियमों और संरक्षण कार्यों का कोई ज्ञान नहीं होता है।

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क्षतिग्रस्त मंदिर के पुराने पत्थरों की जांच करती उप निदेशक कृष्णकांता शर्मा और पुरातत्व विभाग के अधिकारी। इन पत्थरों को यदि पुनर्निमाण में उपयोग में लिया जाता तो मंदिरों का मूल स्वरूप बरकरार रहता।

संरक्षण कार्यों के दौरान जब मंदिरों का मूल स्वरूप बिगड़ने लगा। स्थानीय लोगों और पुरातत्वविदों के भारी विरोध के बाद मामला बिगड़ता देख इसे संभालने के लिए उप निदेशक की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गई और जांच सौंपी गई। विभाग में उप निदेशक पद पर अनिवार्य रूप से विभागीय अधिकारी को ही तैनात किया जाता है।

बताया जा रहा है कि उप निदेशक कृष्णकांता शर्मा ने अधिकारियों के साथ दोनों मंदिर समूहों का दौरा किया और अपनी रिपोर्ट निदेशक पीसी शर्मा को सौंप दी। रिपोर्ट के संबंध में जब कृष्णकांता शर्मा से जानकारी चाही गई तो उनका जवाब था कि इस संबंध में कोई भी जानकारी निदेशक ही दे सकते हैं। वहीं अधिशाषी अभियंता मुकेश शर्मा का कहना था कि मामले की जांच चल रही है, जो भी होगा सामने आ जाएगा। मेरे विभाग में आने से पूर्व यह कार्य हुआ था, मैने तो इस कार्य को रुकवाया है।

सूत्र बता रहे हैं कि उप निदेशक ने इस मामले में पूरे इंजीनियरिंग विभाग पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं और इंजीनियरिंग शाखा को मूल स्वरूप बिगाडऩे का दोषी बताया है। रिपोर्ट में कोटा वृत्त अधीक्षक उमराव सिंह पर भी सवाल खड़े किए गए हैं कि उन्होंने समय रहते इस पर कोई एक्शन क्यों नहीं लिया? काम की निगरानी करना उनकी जिम्मेदारी थी। यद्यपि वे समय-समय पर साइटों पर भी गए लेकिन उन्होंने मुख्यालय को स्मारकों पर हो रहे नियम विरुद्ध कार्य की सही जानकारी स्पष्ट रूप से नहीं दी।

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